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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 70, अक्टूबर(प्रथम), 2019

वो खेल का मैदान

शबनम शर्मा

खेलते थे हम कभी, कबड्डी, फुटबाल, लम्बी दौड़ व लंगड़ी टाँग, बैठते थे घंटो, बतियाते थे सब बातें, कभी लड़ पड़ते, तो कभी सुलझे से मुस्कुराते। होते ही शाम, निकल पड़ते, सब एक-दूसरे को बुला-बुलाकर, पहुँच जाते इस मैदान में व देखते कौन नहीं आया, भेजते छुटकू को उसे घर से बुलाने ग़र बीमार होता तो पूछने जाते, वरन् पकड़ ले ही आते। सारा मैदान खुशी के मारे, ठहाके भरता, गिर जाता कोई तो उसे मरह़म भी करता हो जाता अंधेरा, पर खत्म न होता खेल, बनाते रहते चलाते रहते वो नन्हें अपनी रेल। घर से कई संदेशे आते अंधेरा घिर आया, घर वापस आओ ‘‘बस 2 मिनट और, अभी आता हूँ।’’ कह लौटा देते, भईया वापस जाओ।


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