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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 70, अक्टूबर(प्रथम), 2019

दरवाज़े पर खड़ी लड़की

शबनम शर्मा

ससुराल से प्रताड़ित, मन से बेचैन, शरीर से शिथिल, काम की मारी, घर से निकाली गई, इक म़द़म सी आस, दिल में दबाए, भारी कदमों से मायके के दरवाजे पर खड़ी इन्तज़ार करती उसे अन्दर बुलाए जाने का देखकर भाँप लिए गए हालात, शुरु हो गई सबकी दलीलें भाई, भाभी के डर से, माँ, पिता के डर से, कोने में खड़ी ताकती रही, गूंगी, बहरी व मूक सी, याद आया उसे वो ज़माना, जब वो आई थी ब्याही इस चौखट में, परीक्षा की घड़ियाँ समाप्त होने का नाम ही न ले रही थी, हर नज़र वक्त ये ही चीखता, ‘‘देखते हैं कैसे कर पाएगी?’’ चुपचाप अंधेरे मुँह उठना, देर को सोना, हर किसी की ज़रूरतों को पूरा करना फिर भी यही सुनना, ‘‘चार रोटी खायेगी, तो कुछ काम तो करे।’’ अविरल आँसू बहे हैं उसके। धीरे-धीरे, विश्वास की चाल, माँ ने बेटी का हाथ पकड़ा, अन्दर लाई, बिठाया और कुछ समझाया भारत की नारी जब लाँघती चौखट तो नहीं आती लौटकर कभी, उसे बनानी है अपनी वह दहलीज़, चली गई वापस बटोर कर आँसू, लेकर हिदायतें वह अपने घर, देखते रह गये भाई, बापू व उस मकान की दिवारें।


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