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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 70, अक्टूबर(प्रथम), 2019

ख्वाब

शबनम शर्मा

आज मैं गुजरी उस सड़क से कराहती सी आवाज़ थी आई मैदान वो रोया, पीपल चीखा ‘‘बोलो मेरे बच्चे कहाँ है भाई?’’ इक्के-दुक्के बच्चे बैठे हाथों में मोबाइल था भाई, मैदानों की सारी खुशियाँ इस डिबिया ने बेचकर खाई। घास उग आई, कूड़ा भर गया कहाँ रह गई अब वो माँ जाई जो कहती थी अपने लल्ला को पल भर जा क्यूं न हवा मैदान की खाई? खड़ी रही मैं मूक सी मूर्त देती क्या मैं उसे जवाब पूछते हैं जब मेरे ही बच्चे खेल मैदान के, उनका ख्वाब टी.वी., मोबाइल आज के खेल रुक गई भईया बच्चों की रेल।


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