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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 70, अक्टूबर(प्रथम), 2019

आँखें.........

संगीता चौरडिया

यह छोटी सी आंखे जब पहली बार खुलती हैं रोते हुए इस दुनिया को देखती है और जब यह आखरी बार बन्द होती हैं तब दुनिया रो पड़ती है यह आँखें ही होती हैं जिनमें चाहे खुशी हो या गम इन आँखों से झलकता है जो मुख न बयाँ कर पाये वो आँखें बयाँ कर देती हैं अजीब होती है इनकी कहानी जो इसे पसंद है वो भी इन आँखों में रहता है और जो नापसंद हो वो भी इन आँखों रहता है..... यह जब खुलती हैं तो पुरी दुनिया देख लेती है और जब इनके अंदर कुछ गिर जाये तो नहीं देख पाती हैं...... इन आँखों का खेल ही निराला होता है साहब जिससे इन्हे मोह हो जाता है तो उसकी सारी बुराईयाँ छिप जाती हैं.... और घृणा हो जाए तो उसकी सारी अच्छाईया छिप जाती हैं..... जो किसी को तराशता है उसे खूबी मिल जाती है और जो तलाशता है उसे खामी मिल जाती है...........


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