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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 70, अक्टूबर(प्रथम), 2019

हर बार दर्द देते हो

रवि प्रभात

हर बार दर्द देते हो और कहते हो जीते भी रहो पास तो आते नहीं पर जीने की तलब छीन लेते हो खुशियाँ कहाँ ढूँढूँ जब पास तुम नहीं होते हो जिंदगी गुजरती भी गई, चलती भी गई कदम बढ़ने से रोक लेते हो जहां तुम नहीं, वहां जिंदगी थम सी गई हमें देख जब तुम मुंह फेर लेते हो आते हो याद हर पल हमें, पल पल कहते हो याद क्यों करते हो ये कैसी दुविधा में डाल दिया तुमने साँस तो लो पर क्यों जीते हो


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