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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 70, अक्टूबर(प्रथम), 2019

स्वर्ण मृग

रामदयाल रोहज

भरती भादो की संध्या सुख से मरु की झोली भरती खूब कुलांचे अब स्वर्णिम मृगों की टोली विचर रही हर्षित होकर आँखों को बहुत चुराया कनक चमकता अंगों से जैसे मरुधर की काया मादक सुरभि फैली है अंबर ने धनुष उठाया चोंक गए दौङे चिंकारे मन को बहुत चुराया

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