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Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 70, अक्टूबर(प्रथम), 2019

भयाक्रांत

राकेश भ्रमर

वे भयभीत हैं, आतंकित हैं किसी अदृश्य मुंहनोचवा से, काल्पनिक चोटीकटवा और अज्ञात बच्चा चोर से... उनके मस्तिष्क संज्ञाशून्य हैं आंखों में धुंध है, फिर भी वे ढ़ूंढ़ लेते हैं किसी निर्धन , विकलांग अधपगलाये व्यक्ति और बूढ़ी असहाय स्त्री में एक मुंहनोचवा, चोटीकटवा और बच्चा चोर को फिर अट्टहास लगाते हुए वे पीट-पीट कर मार डालते हैं उस तथाकथित मुंहनोचवा, चोटीकटवा और बच्चा चोर को, जिसे किसी ने कभी अपराध करते नहीं देखा. परंतु उनके भय ने उस असहाय, लाचार और अशक्त व्यक्ति/स्त्री को अपराधी बनाकर निर्मम सजा दे दी. इसके बावजूद उनका भय खत्म नहीं हुआ... वे अभी भी भयभीत हैं, और ढूंढ़ रहे हैं मुस्तैदी से भीड़ भरे चौराहों में, सुनसान गलियों में बस्ती और बाजारों में किसी मुंहनोचवा, चोटीकटवा और बच्चा चोर को जिसे वह अपने भय का अगला शिकार बना सकें.


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