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Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 70, अक्टूबर(प्रथम), 2019

दुखी हूं

डॉ राजू तिवारी

आज मैं दुखी हूं, हां आज मैं बहुत दुखी हूं दुखी हूं बहुत दुखी हूं, पर मैं आज क्यों दुखी हूं अपनी सफलता पे दुखी हूं, या उसकी आश टूट जाने पे दुखी या उसकी आवाज़ न बन पाने पे दुखी हूं, हां मैं तब दुखी हूं जब सड़क पर पढ़ाई छोड़, भीख मांगते गुड़िया-गुड्डो को देखता हूं तो बड़े बड़े पोस्टरों में दावा करने वाली, सरकारें मुझको अंधी लगती हैं जब सड़क किनारे पड़े भिखारी को, दिनभर मांगने पर भी भूखा देखता हूं तो बड़े बड़े होटलों में मिलने वाली ताजी तरकारी भी मुझको ठंडी लगती है जब गरीबों का पेट काट धन्ना सेठों की तिजोरी जबरदस्ती भरी जाती है आने वाले चुनावों की आहट में गरीबों की अट्ठन्नी चवन्नी बन जाती हैं सरकारी महकमों में खुलेआम भ्रष्टाचार और रिश्वतखोरी करी जाती हैं ईमानदारी का ढींग भरने वाली सरकारें, मदिरा में डूबी बेगैरत वेश्या बनती हैं तब मैं दुखी होता हूं, हां मैं बहुत दुखी होता हूं, अपने कुछ न कर पाने पे सरकारी शिष्टाचार की बंदिशों में, गुंडे मवाली और बलात्कारी नेताओं के आगे शीश झुकाने पर भ्रष्टाचार में सर से पैर तक लिपटे शीर्ष अधिकारी से हाथ मिलाने पर, जब मैं विवश हो जाता हूं, तो अहिंसा से मिली आजादी मुझे बंदिश लगती हैं जब अपनों को ही जाति धर्म के नाम पर बांटता है, समानता की बात करने वाला विधान, राम नवमी की छुट्टी का आनंद उठाने वालों के, राम के जन्म पर सवाल उठाने के ज्ञान पर, हमें नैतिकता का पाठ पढ़ाने वाले, चोरी करके बने बिधान पर इन सब पर सवाल न उठा पाने पर, उसके दुःख दर्द और विवशता के आशुआओं से बने बादल के बरसने पर, उसके साथ खड़े न हो पाने पर, मैं दुखी होता हूं, हां मैं बहुत दुखी होता हूं, जब सच का साथ न देकर, बुरे के साथ खड़ा होता हूं जब गरीब मेहनती बच्चों का हक छीन कर, अपनों में बांटते बामपंथ को देखता हूं देश को लूट लूटकर अपना घर भरते, समाजवाद के पहरेदारों को देखता हूं जन जन से बनी कांग्रेस को, परिवार में फंसकर, जन जन को लूटते देखता हूं ईमान के नाम पर बनी आप को, बेईमानों के हाथों बिकते-लुटते देखता हूं राष्ट्रवाद के नाम पर, राष्ट्र को बेचते (मारते), राष्ट्रवादियों को देखता हूं हां, तब मैं दुखी होता है, बहुत दुखी होता है जब अशिक्षित नेताओं की चाटुकारिता करते, बड़े बड़े प्रोफेसरों को देखता हूं जब पढ़ें लिखे काबिल युवाओं को नौकरी के लिए भटकते देखता हूं सांठगांठ और साजिश से, निकम्मों को मलाई खाता देखता हूं एक बाप को अपनी ही बेटी का घर तोड़ता देखता हूं सर्वार्थवश भाई को भाई से लड़ते हुए देखता हूं बहन को बहन के खिलाफ साजिश करते हुए देखता हूं इंसान को इंसानियत से गिरते हुए देखता हूं तब मैं दुखी होता हूं, हां बहुत दुखी होता हूं अब मैं खुद को बाज़ारीकरण में फिट नहीं पाता हूं अपने होने या न होने का फ्रक समझ नहीं पाता हूं इसलिए, मैं दुखी हूं, हां मैं बहुत दुखी हूं काश! आप सब भी मेरे जैसे ही दुखी होते तो इस जग में हम दुखी को ढूंढे ना पाते आप सब अगर सुखी होते तो अपने सुख में हम काहे को दुखी होते हां मैं दुखी हूं, बहुत दुखी हूं अपने सुख में, आपके दुःख में कुछ ना कर पाने से हां मैं दुखी हूं, आज मैं बहुत दुखी हूं


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