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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 70, अक्टूबर(प्रथम), 2019

कि आज़ाद हो तुम

प्रो. राजेश कुमार

बोलो जितना चाहे बोलो जब चाहे बोलो जहाँ चाहे बोलो बस बोल हमारे होंगे। लगाओ जितना चाहे लगाओ जब चाहे लगाओ जहाँ चाहे लगाओ बस नारे हमारे होंगे। गाओ जितना चाहे गाओ जब चाहे गाओ जहाँ चाहे गाओ बस गीत हमारे होंगे। देखो जितना चाहे देखो जब चाहे देखो जहाँ चाहे देखो बस दृश्य हमारे होंगे। सुनो जितना चाहे सुनो जब चाहे सुनो जहाँ चाहे सुनो बस भाषण हमारे होंगे। जियो जितना चाहे जियो जब चाहे जियो जहाँ चाहे जियो बस जिंदगी हमारी होगी। चढ़ो जितना चाहे चढ़ो जब चाहे चढ़ो जहाँ चाहे चढ़ो बस सीढ़ी हमारी होगी।


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