मुखपृष्ठ
साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 70, अक्टूबर(प्रथम), 2019

स्वच्छन्द आसमान

पुष्प राज चसवाल

कल्पना की किसी भी उड़ान से आगे, निःसीम तक फैला जो न हो सका कभी भी मैला, वह उसके शैशव का साथी स्वच्छन्द आसमान जाने कहाँ खो गया! उसे पता ही न चला कि कब लील लिया किसी शहर के बढ़ते आकार ने उसका वह उषाकाल, जिसका दिनकर शिशु की भाँति मचलता रक्तिम आभा बिखेरता उसके आँगन में खेलता था नित्य प्रात: नई आशा के संचार के खेल! नये जीवन की बढ़ती बेल के खेल! नई आभा के विकसते आलोक के खेल! इस शहर में कैद उसकी प्रभा अब किसी पंखहीन पक्षी के समान तड़पती है अपंग-सी छटपटाती क्योंकि वह जानती है---- इस बेरहम शहर से अब छुटकारा असम्भव है, जिसने प्रगति के नाम पर लील लिया था उसका गाँव और इसके साथ ही शैशव का उसका स्वच्छन्द आसमान!


कृपया रचनाकार को मेल भेज कर अपने विचारों से अवगत करायें