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Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 70, अक्टूबर(प्रथम), 2019

उदास आदमी

ओम प्रकाश अत्रि

आज उदास है हर वह आदमी जिसने कभी रंग-बिरंगी दुनिया का सुख-भोग नहीं किया । जिसने नहीं लिया है कभी जीवन में सुख की नींद , हमेशा काम के पीछे ता-उम्र खटता रहा है । जिसने कभी नहीं समझा जिंदगी की अहमियत , हमेशा मेहनत मजदूरी के पीछे लगा रहा है । जिसने कभी नहीं पाया पूरा मेहनताना , न ही कभी पाया सिर ढकने लिए एक जगह मजबूत ठिकाना । जिसने खुद गुजर किया रात-दिन एक करके पर मालिकों का खजाना भरकर माला-माल कर दिया है । जिसने अपने बल-बूते संभाले हैं बड़े से बड़े उद्योग धंधे , आज वही निराश होकर बाज़ारों की गरमाहट से जल सा रहा है । जिसने खुद निराहार रहकर पारन कराया है आज वही काला बाजारी और पूँजीवादी पाटों के बीच पिसता जा रहा है । आज उदास है हर वह आदमी जिसने श्रम रूपी नाव को पूंजीवाद के समुद्र में बहने के लिए छोड़ा है ।


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