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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 70, अक्टूबर(प्रथम), 2019

जीते जी मरते रहें ?

ओम प्रकाश अत्रि

जिंदगी ! क्या है हमारी महज एक घरौंदा है , जो जब चाहा जैसा चाहा रौंदकर चला गया ? सपने क्या अपने नहीं पानी का बुलबुला हैं जो छड़ भर के लिए ठहरा-कर फिर उंगली लगाकर फोड़ दिया गया ? ये हाथ ! क्या हैं हमारे क्या कोई यंत्र हैं जो जब-तक चलायमान थे तब-तक तुम काम लिया फिर गतिहीन होने पर कबाड़ी को दे दिया ? मेहनत क्या है हमारी राशन की दुकान है जो जब चाहा जैसा चाहा कीमत बदल दिया ? पारिश्रमिकता क्या है हमारी कोई प्रसाद है जो अपने ही स्वेच्छा से जब चाहा जितना चाहा हाथों में थमा दिया ? श्रमिक क्या हूं हम महज एक सवारी हूं जो जिसने चाहा जब चाहा जिस ओर सवार होकर चल दिया ? क्या इसी लिए हम काम के पीछे हड्डियों को जर्जर करते , कि न कर सकें क्षुधा को शान्त सिर ढकने के लिए एक घर भी न बना सकें ? क्या इसी लिए रात-दिन काम में मचे रहते है, कि तुम्हारे सुख-चैन के लिए हम जीते-जी मरते रहें ?


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