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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 70, अक्टूबर(प्रथम), 2019

गुरु का सानिध्य

ओम प्रकाश अत्रि

जब भी मैं होता हूं गुरु की छत्र-छाया में मन मेरा दीपक सा जल रहा होता है। उठने लगती हैं मेरे अन्तःकरण में मानसिक तरंगे और ज्ञानोदय से बुद्धि का दीया टिमटिमाने लगता है । मिटने लगती है मेरे मानस-पटल पर पड़ी सारी शिकन भी , अज्ञानता का अंधेरा मेरी आँखों के सामने से दूर होने लगता है । होने लगता है ज्ञान रूपी प्रकाश का संचार , वर्षों से बंद पड़े मन के कपाट गुरु-वचनों के माध्यम से सहजता से खुलने लगता है । भरने लगती है तन के अंतःपुर में गतिमान ऊर्जा , आगे बढ़ने के लिए व्यग्रता का कोलाहल होने लगता है । गुरु की समीपस्थता से मन की उत्सुकता का निदान होने लगता है आलस्य आदि व्यसनों का तन से क्षरण होने लगता है । लेने लगती हैं हिलकोरें नित नई-नई उमंगें , गुरु द्वारा दी गई ज्ञान रूपी ज्योति से अंधकारमय मार्ग में प्रकाश होने लगता है । जब भी मैं रांह से विमुख होकर विकारों से ग्रसित होकर असंतुलित होता हूं तब-तब गुरु के सानिध्य से उनके द्वारा प्रशस्त की गई रांह पर चलकर संतोषप्रद होता हूं । उनके मीठे वचनों का पान कर धन्य होने लगता हूं , उनकी सख्ती और सहजता से तपिस और शीतलता से हमेशा कृतार्थ होता रहता हूं ।


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