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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 70, अक्टूबर(प्रथम), 2019

बापू का समर्पण

अनिल कुमार

चलो आज मैं एक कथा दोहराता हूँ एक बूढ़ मरियल की बात बताता हूँ वैसे तो वह लंदन जाकर वकालात पढ़ आया था पर माँ की ममता ने पास उसे बुलाया था तो छोड़ दिया उसने वह काला कोट और पहन लिया अधनंगा लगोट केवल अकेले ही बिड़ गया वह गौरों से ना कोई हथियार उठाया ना शमशीरों से बिड़ने को सेना दल लेकर आया बस प्रबल इच्छाशक्ति थी मन में जो ठान लिया उसको कर गुजरने की बिन रक्त बहाये आजादी की उड़ान भरने की तो हासिल करने को आजादी पूरा जीवन कर दिया उसने मातृभूमि की मुक्ति को समर्पित बस लेकर सत्य और अंहिसा का दूत वह अवतार नहीं था था बस एक साधारण मानव पर शक्ति थी उसमें अपरम्पार सोचा नहीं था उसने इक भी बार कि उसका भी है घर-परिवार वह तो मानववादी था सबको अपना कहने का आदी था इसीलिए सबकी गुलामी का जहर हँसते-हँसते अकेला पी गया शिव नहीं बन सकता था फिर भी राम-से वह कर्म कर गया कहता था वह बार-बार बस एक बात छोटी-छोटी कोशिशों से ही होती है एक नये युग की शुरुआत इसीलिए तो वह अकेला सारे देश को लेकर अंग्रेजों के शासन को मुठ्ठी में धर गया बिन रक्त बहाये भी भारत माता को वह आजाद कर गया और फिर एक दिन ऐसा भी आया किसी अपने को ही वह मन नहीं भाया बीच चौराहे पर ही बन्दूक की गोली से सीना छलनी कर उस सत्यवादी का रक्त बहाया फिर भी मरता हुआ वह उन रक्त से रंचित हाथों को माफ़ कर गया हे राम ! का अन्तिम अभिवादन कर वह बूढ़ा स्वर्ग का पथ चढ़ गया।


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