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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 70, अक्टूबर(प्रथम), 2019

रेज़ा

मीनाक्षी कर्ण

सुबह- सुबह सात बजे अचानक एम्बुलेंस की आवाज़ से सोसाइटी वाले सभी हड़बड़ा कर अपने अपने घर से बाहर निकल कर झांकने लगे, तभी एम्बुलेंस शर्मा जी के घर के आगे... जहाँ नयी मकान बन रही थी, वहाँ आकर रुकी, सभी आश्चर्य मे थे कि वहाँ एम्बुलेंस क्यों आई है? वहाँ तो कोई रहता नही है, सभी एम्बुलेंस के पास दौरे,.. एक रेजा खून से लथपथ जमीन पर गिरी हुई थी, वह गर्भवती भी थी, सभी आनन फानन मे उठा कर हॉस्पिटल ले गये, वहाँ वह जीवन और मौत के बीच जंग लड़ रही है. शर्मा जी की पत्नी स्नेहलता के आँखो से आंसू रुक ही नही रहे थे... वह अतीत मे खो गई,

घर के सामने तीन तल्ला मकान जब से बनाना शुरू हुआ था, तब से उसे देख रही थी-

सामान्य कद की, सांवली सी, सामान्य नाक -नक्श वाली, बहुत सुन्दर तो नही, पर आकर्षक जरूर लगाती थी,

वह लगभग उन्नीस -बीस साल से ज्यादा की नही रही होगी,

पूरे मांग में टकटक लाल सिंदूर भरे हुए, बड़ी सी बिंदी लगाए रोज सबसे पहले आकर बालू पर बैठ कर फ़ोन से बात करना उसकी प्रत्येक दिन की आदत थी,

...लगता है नयी नयी शादी हुई है... स्नेहलता मन ही मन सोचती.

स्नेहलता को जब भी अपने काम धंधे से फुर्सत मिलती, वह बरामदे मे आकर बैठ जाती,

और उस रेजा को बड़े ध्यान से देखती रहती,

उसे इस काम मे बड़ा मन लगता,

सिर पर एक साथ छह - सात ईट को रख कर संतुलन बना कर तीन तल्ले पर चढ़ती फिर उतरती यह क्रम दिन भर चलता रहता, सभी आपस मे हसीं -मज़ाक भी करते, कभी कोई कुली किसी रेजा के साथ हसीं ठिठोली करता, तो कोई किसी रेजा के साथ छेड़ छाड़ करता, दोपहर एक डेढ़ बजे सभी रेजा -कुली काम छोड़ कर खाते पीते और सुस्ताते, कोई अपना गमछा बिछा कर सोता तो कोई अपना सर्ट ही खोलकर बिछाता.. सभी कुछ देर के लिए आराम करते, स्नेहलता भी इस समय अपने काम मे लग जाती, उसके बच्चे और पति के आने का समय हो जाता था.

एक दिन स्नेहलता सुबह -सुबह बरामदे मे बैठी थी, तभी स्नेहलता की नजर एक दूसरी रेजा पर पड़ी... सभी कामगार आया हुआ है, पर उसकी नजर जिसे ढूंढ़ रही है... वो आज दिखाई नही दे रही है, सभी काम मे लग गये, पर आज स्नेहलता को मन नही लग रहा था... किसी काम मे, अनजाने ही उस रेजा के प्रति वह लगाव महसूस करने लगी थी, आज नही आने पर परेशान हो रही थी,

स्नेहलता घर के काम भी निपटा रही थी और मन मे हजार सवाल भी उठ रहे थे... 'क्यों नही आयी आज? क्या हुआ उसे?

उसे मन नहीं लग रहा था, दोपहर हो गई थी बच्चे और पति भी घर आ गये थे, सभी खाना खा कर आराम करने लगे... पर

स्नेहलता बरामदे मे जाकर खड़ी हो गई, उसे बार बार इच्छा हो रही थी कि वहाँ काम कर रही दूसरी रेजा से पूछे कि- 'वो लड़की क्यों नही आयी?

उसे तो उस लड़की का नाम भी नही पता था,... 'संकोचवश वह नही गई और घर मे आकर बैठ गई.

दूसरे दिन भी उसी तरह बरामदे मे बैठ कर चाय पीने लगी और सामने सभी रेजा कुली आकर अपने काम मे लग गये पर... वो लड़की आज भी नही आयी, स्नेहलता घर के काम को जल्दी जल्दी निबटाकर

बरामदे मे जैसे ही निकली उसकी नजर एक रेजा पर परी जो कड़ाही मे बालू निकाल रही थी, वो जोर से आवाज दी -`ऐ लड़की !... इधर सुनो !, रेजा चारों तरफ सिर घुमा कर देखी पर उसे कोई नजर नही आया, वह फिर से बालू निकालने मे व्यस्त हो गई, तभी उसे फिर से आवाज़ सुनायी दिया, स्नेहलता बरामदे से बाहर निकल कर आवाज दी -'इधर सुनो इधर' !वो रेजा उसके पाए आयी...

'एक और लड़की जो तुम्हारे साथ काम करती थी... वो क्यों नही दो दिन से आ रही है?

दीदी कौन सी लड़की?

वो जो तुम्हारे साथ काम करती थी....सावंली सी, छोटी कद वाली, जो बड़ी सी बिंदी और पूरा मांग सिंदूर लगाती थी,

अच्छा !अच्छा !... वो सुकमनी ! वो तो बीमार है, उसके पेट मे दर्द है इसलिए नही आ रही,.. फ़ोन करके बोली थी, कल से आएगी, ठीक !... कहकर वो जाने लगी, तभी पीछे से आवाज़ आयी - दीदी !आप सुकमनी को जानते है क्या? नही... कहकर स्नेहलता वहाँ से चली गई, उसे डर भी लग रहा था कि कही कोई देख न ले, जल्दी जल्दी अपने घर के अंदर चली गई.

उसे थोड़ा अच्छा लगा कि कल वो आ जाएगी.

आज पहले की तरह ही वो रेज़ा... सुकमनी सबसे पहले आकर बालू के पास बैठ कर फ़ोन से बाते करने लगी, पर उसके चहरे पर वो चमक और आकर्षण नही दिखी, थोड़ी मुरझाई हुई और सुस्त दिखी, आज वह ईट भी कम ले रही थी,

स्नेहलता कुछ देर खड़ी होकर उसका ईट ढोना देखती रही, फिर घर के अंदर आकर अपने कामो को निपटाने लगी, वह मन ही मन सोचती भी जा रही थी... कुछ तो हुआ है.... सुकमनी को, जो इतनी बीमार दिख रही है.... क्या हुआ है उसे?

पांच बजे सब कुली रेजा काम ख़त्म कर अपने अपने हाथ मुँह धो रहे थे, तभी स्नेहलता बाहर निकली उसकी नज़र सुकमनी पर पड़ी, वह उसे धीरे से आवाज़ देने लगी -"सुकमनी... सुकमनी... ऐ सुकमनी "

सुकमनी इधर उधर देखने लगी तभी उसकी नज़र सामने खड़ी स्नेहलता पर पड़ी जो उसे हाथों से इशारा कर कर बुला रही थी, उसे कुछ आश्चर्य भी हुआ कि.. उसे क्यों बुला रही है?

सुकमनी वहाँ जाकर पूछी -"क्या हुआ दीदी "?

"क्या हुआ? तुम्हारी तबियत ठीक नही है क्या? दो दिनों से दिखाई नही दे रही थी... तो कल मै तुम्हारे साथ में जो दूसरी रेजा काम करती है उससे पूछी.. वही बताई कि उसकी तबियत ठीक नही है, "

सुकमनी को थोड़ा आश्चर्य भी हुआ कि ये मेरे बारे मे क्यों पूछ रही है?

'हाँ दीदी' -मेरी तबियत ठीक नही है,

क्या हुआ तुम्हे?

...थोड़ा शरमाते हुए बोली -'मै माँ बनने वाली हू '

अरे वाह ! ये तो खुशी की बात है...

जब तुम्हारी तबियत ख़राब थी, तो आज काम पर क्यों आयी?...इस तरह अपनेपन से बात करना सुकमनी को भी अच्छा लग रह था, वह उदास मन से जवाब दी -

' क्या करती दीदी कितने दिन छुट्टी लेती अब तो ज्यादा काम करना पड़ेगा, अभी तक तो दो ही आदमी थे, अब एक बच्चा आ जायेगा तो खर्च भी बढेगा न',

ठीक है....पर तुमको अपना भी ध्यान रखना पड़ेगा,

तुम्हारा पति क्या काम करता है?

...'वह राजमिस्त्री है '

तब तो बहुत अच्छा है दोनों पति -पत्नी काम करती हो, तो चिंता किस बात की है? ...

सुकमनी थोड़ी दुखी हो गई,

अरे !क्या हो गया?

मै तो ऐसे ही पूछ दी.. तुम दुखी क्यों हो गई?

कुछ नही दीदी...' पति को लेकर ही मन थोड़ा दुखी हो जाता है , अभी छह महीना पहले ही मेरी शादी हुई है, लेकिन पति इतना शराब पीता है कि सब पैसा खर्चा कर देता है, मेरे पैसा से घर खर्च चलता है, उसमे मेरा इलाज कैसे चलेगा?... और फिर बच्चे का कैसे होगा?

'उसे बोलो अब बच्चे के लिए शराब पीना छोड़ दे ' -स्नेहलता बोली

इसी बात का घर में झगड़ा होता है, फिर भी पीना नही छोड़ता है .. दीदी.

स्नेहलता और सुकमनी में ये सब बात हो ही रही थी कि दूसरी रेजा ने आवाज देकर कहा- 'जाना नही है सुकमनी?... हाँ आ रहे हैं तुम चलो ,

.... अच्छा दीदी जाते है, कहकर वो चली गई,

स्नेहलता भी अपने घर के अंदर चली आयी,

उसे अब सुकमनी के इस दयनीय अवस्था से और भी अधिक सहानुभूति होने लगी, अब वह कुछ ज्यादा ही ध्यान देने लगी, अब प्रत्येक दिन एक बार उसका हालचाल पूछ लेती, सुकमनी को भी किसी चीज की जरुरत होती तो वह आकर ले लेती, स्नेहलता को सुकमनी के साथ एक अजीब सा जुड़ाव महसूस होता, उसके बच्चे के आने का मानो वह भी बेसब्री से इंतजार कर रही है, सुकमनी अब काम करने में असमर्थ लगती, उसका सातवां महीना चल रहा था, पेट बड़ा हो गया था, तीन तल्ले पर ईट और बालू ढोकर ऊपर चढ़ना उतरना मुश्किल हो रहा था, उससे अब ठीक से काम नहीं हो रहा था, लेकिन ठेकेदार को तो काम से मतलब था, उसे प्रत्येक दिन डांटता कि-' तुमसे काम नहीं होता तो तुम काम छोड़ दो',

सुकमनी अभी काम छोड़ना नहीं चाहती थी, उसे पैसों की सख्त जरूरत थी,दो महीना किसी तरह काम कर लेना चाहती थी...

आज घर के छत की ढलाई है, सुबह से ही घर के बाहर शोर शराबा चल रहा है, रेज़ा , कुली, मिस्त्री काफी संख्या में सब बाहर इकट्ठा हुए है, ढलाई मशीन की आवाज़ से पूरे सोसाइटी के लोग परेशान है,

स्नेहलता बाहर निकल कर खड़ी हो गई, ये देखने के लिए कि - सुकमनी क्या कर रही है? उसे आश्चर्य हुआ कि वह सर पर बालू, गिट्टी, और सीमेंट का मसाला लेकर तीन तल्ले पर जा रही है, आ रही है, उसके इस अवस्था से किसी को कोई परवाह नही है, यहाँ तक कि उसे और जल्दी जल्दी काम करने के लिए डांटा जा रहा था,...

नीचे कुछ मिस्त्री, कुली मसाला तैयार करने में व्यस्त थे, कोई मिस्त्री रेजा के सिर पर ईट रख रहा है तो कोई सिर पर मसाला उठाकर रख दे रहा है,

सभी रेजा बारी बारी से चढ़ उतर रही है, और मिस्त्री, कुली ये सब नीचे खड़े होकर सीमेंट, बालू, गिट्टी मिलाने का काम कर रहे है,... सभी बातचीत, हसीं मज़ाक कर है.

स्नेलता थोड़ी क्षुब्द हुई कि ये सारे पुरुष है ये सब आसानी से ऊपर चढ़ उतर सकते है..... फ़िर भी इन लोगों ने आसान काम ले लिया... और जो ऊपर चढ़ने उतरने का मेहनत वाला काम है , वो इन रेजाओ को सौप दिया गया हैं,

स्नेहलता नीचे खड़ी होकर सब देख रही थी, और मन ही मन सोच रही थी कि -'लोग बोलते है स्त्री शारीरिक मेहनत वाला काम नही कर सकती है, और पुरुष मेहनत वाला काम करते है, पर यहाँ पर तो सब उल्टा ही हो रहा है, मेहनत वाला काम इन रेजाओं से कराया जा रहा है, और कम मेहनत वाला काम ये मिस्त्री लोग कर रहे हैं.

सारा दिन इसी तरह से छत ढलाई का काम चलता रहा, रात में करीब नौ - साढ़े नौ बजे काम समाप्त हुआ, सभी लोग चले गये और शोरगुल समाप्त हुआ, स्नेहलता भी थोड़ी राहत की सांस ली.

दो दिन कामगार नही आये, सुकमनी भी काम पर नही आयी, स्नेहलता सुकमनी को लेकर थोड़ी चिंतित भी हुई -'पता नही उसकी तबियत कैसी है? '

वह लड़की भी नही आयी जो उसके साथ रहती थी, जिससे उसका हाल समाचार जान सके, .... दो दिनों के बाद आज जब सुबह एम्बुलेंस की आवाज से बाहर निकली तो सुकमनी को इस अवस्था में देख उसके मुँह से चीख निकल गई, अरे ! यह क्या हुआ सुकमनी को? बस वह इतना ही सुन पायी कि छत पर पानी डालने गई थी, उतरते समय सीढ़ी से पैर फिसल गया,

स्नेहलता घर आकर भगवान से हजार मन्नते करने लगी, हॉस्पिटल मे डॉक्टर भी माँ और बच्चे को बचाने की पूरी कोशिश करते रहे.. पर ईश्वर को कुछ और ही मंजूर था...

एक सप्ताह तक जीवन और मौत के बीच संघर्ष करते -करते सुकमनी आज जीवन की जंग हार गई.


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