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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 70, अक्टूबर(प्रथम), 2019

गौरय्या का नीड़

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक

गौरय्या का नीड़, चील-कौओं ने हथियाया है हलो-हाय का पाठ हमारे बच्चों को सिखलाया है -- जाल बिछाया अपना छीनी है, हिन्दी की बिन्दी भी अपने घर में हुई परायी, अपनी भाषा हिन्दी भी खोटे सिक्के से लोगों के मन को बहलाया है -- हिन्दीभाषा से हमने, भारत स्वाधीन कराया था हिन्दी में भाषण करके, सत्ता का आसन पाया था लेकिन गद्दी पाते ही उस हिन्दी को बिसराया है -- चीन और जापान आज भाषा के बल पर आगे हैं किन्तु हमारे खेवनहारे नहीं नींद से जागे हैं अन्न देश का खाकर हमने, राग विदेशी गाया है -- विश्वपटल पर कैसे होगी, अब पहचान हमारी वाणी क्यों हो गयी विदेशी, ऐसी क्या है लाचारी पुरखों के गौरव-गुमान पर भी संकट गहराया है -- हुक्मरान हिन्दी के दिन को, हिन्दी-डे बतलायें जब उन गूँगे-बहरों को अपनी, कैसे व्यथा सुनायें अब हलवा-पूड़ी व्यञ्जन छोड़े, पिज्जा-बर्गर खाया है --

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