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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 70, अक्टूबर(प्रथम), 2019

कैसे बचाएँ

डॉ. मनोहर अभय

बगीचे नरगिसी कैसे बचाएँ चल रहीं टेढ़ी हवाएँ बाग़ पर बाग़ खाली हो रहे हैं बरगद सरीखे पेड़ ऊँचे आज आपा खो रहे हैं लताएँ क्या बताएँ | हम घिसे सिक्के पुराने चलन से बाहर हुए पत्थरों पर तराशे अधमिटे आखर हुए लोग कहते हैं ऋचाएँ| भद्र पुरुषों की यहाँ है भीड़ अपरम्पार कुछ बड़े बूढ़े खड़े कुछ बहुत बीमार पड़ोसियों से माँग लाए बेतुकी तीखी दवाएँ | समय को ललकारते दे रहे जो आप दस्तक रुधिर में आए नहा कर वनमानुषी आपाद मस्तक लहरा रहे काली ध्वजाएँ | पहचान पूरी हो चुकी है मिली बैरंग चिट्ठियाँ शहरी हवेली में भभकतीं बारूद वाली भट्टियाँ जंगलों से पूछिए कह रहीं क्या पीड़िताएँ | पूरी न होने पाएगी मनौती मरघटी मुराद आलेख विघटन के लिखे विप्लवी संवाद क्या करेंगी साजिशी वार्ताएँ |


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