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Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 70, अक्टूबर(प्रथम), 2019

नहीं बदले

डॉ. मनोहर अभय

नहीं बदले ढोते दुपहरी थक गए छाँव के भी पाँव धुंध में धँसने लगे शश्य श्यामल गाँव गल रहीं गलियाँ रोशनी में झमझमाते पथ नहीं पिघले | रंग बदल कर गिरगिटें आकाश छूने में लगीं नकली नगीने से जड़ीं चूड़ियाँ बिकने लगीं हाट में त्योहार के व्योहार हैं बदले |. भक्ति में अनुरक्त हैं सर्वहारा शक्तियाँ वनमानुषों से मिल गईं प्रगतिकामी वृत्तियाँ खुशियाँ मनाते कागजी पुतले | बदलाव की बुनियाद डाली इतरा रहे बहु मंजिले फुटपाथ पर धोते नहाते ये किसी के लाडले | नेवलों को दूध पानी साँप को सहला रहे एक दिनदोनों लड़ेंगे आज हैं बहला रहे ये धुले उजले/नहीं बदले |


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