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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 70, अक्टूबर(प्रथम), 2019

शोकाकुल हैं गीत हमारे

डा. दिवाकर दत्त त्रिपाठी

शोकाकुल हैं गीत हमारे । दुख में डूबे,मलिन, मंद हैं, रुदन कर हैं यह सारे। आँख रो रही,हृदय रो रहा। चहुँ दिशि रुदन का कोलाहल है। अश्रु हमारे सूख रहे हैं, अंतस में एक बड़वानल है। देख रहा सूखी आँखो से, नित्य मौत के वारे न्यारे । शोकाकुल हैं............. भीड़ भरी है, हर कोने तक, दुख तन्हा हैं ,सबके अपने । अश्रु लेप कर ,चिपकाने को, लेकर बैठे टूटे सपने । इस मेरी उजड़ी बगिया को, सावन बीता, बिना संँवारे । शोकाकुल हैं.............. भावहीन ,रसहीन, हो गये, तन्हाई से हार गये हैं । मेरे सपने ,खंजर लेकर , मेरे उर पर मार गये हैं । भावहीन सपने पाले थे , प्रतिफल में है अश्रु पनारे। शोकाकुल .....

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