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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 70, अक्टूबर(प्रथम), 2019

रास्ता भटक गया

डॉ० अनिल चड्डा

जरा दूर तक ही जाना था, रास्ता भटक गया, जीवन की अनदेखी, दुविधाओं में अटक गया। वो सुबह आई कहाँ, जिससे नई आशा जगे, दो ही पल को यहाँ, कोई तो अपना लगे, हाथ पकड़ने से ही पहले, था इसे झटक गया। राह पकड़ी ही कहाँ थी, फिर मैं कैसे भूला हूँ, दास्तान-ए-ज़िंदगी का, हर शब्द ही मैं तो भूला हूँ, बात कहने से ही पहले, माथा था सटक गया।

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