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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 70, अक्टूबर(प्रथम), 2019

हिरनी-सी है क्यों

अवनीश सिंह चौहान

छुटकी बिटिया अपनी माँ से करती कई सवाल चूड़ी-कंगन नहीं हाथ में ना माथे पर बैना है मुख-मटमैला-सा है तेरा बौराए-से नैना हैं इन नैनों का नीर कहाँ- वो लम्बे-लम्बे बाल देर-सबेर लौटती घर को जंगल-जंगल पिफरती है लगती गुमसुम-गुमसुम-सी तू भीतर-भीतर तिरती है डरी हुई हिरनी-सी है क्यों बदली-बदली चाल नई व्यवस्था में क्या, ऐ माँ भय ऐसा भी होता है छत-मुडेर पर उल्लू असगुन बैठा-बैठा बोता है पार करेंगे कैसे सागर जर्जर-से हैं पाल


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