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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 70, अक्टूबर(प्रथम), 2019

अब नहीं आती हैं

योगेन्द्र कुमार निषाद

अब नहीं आती हैं कोई... यादगारी चिठ्ठियाँ। कसमसाती हैं नहीं अब वो कंँवारी चिठ्ठीयां।1 दौर आया है जो ऐसा, खत कहा गुम हो गया, आशिकों के भीड़ मे तन्हा है प्यारी चिठ्ठियाँ ।2 गम खुशी मै साथ, रखता याद की वो जिंदगी, शब्द होते अटपटे पर हूँ .....दुलारी चिठ्ठियाँ।3 भावनाओं के समंदर मै हुआ करता था पर, आज मुझको भूल कर क्यूँ है उतारी चिठ्ठियाँ।4 कह रही हैं चिठ्ठियाँ मत छोड़ तन्हा तू मुझे, अब हुई बैरंग "योगी"....... राजदारी चिठ्ठियाँ।5

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