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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 70, अक्टूबर(प्रथम), 2019

ग़ज़ल कह दूँ

बृज राज किशोर 'राहगीर'

किले, दरबार, गलियारों, कँगूरों पर ग़ज़ल कह दूँ। वहाँ मँडरा रहे सब जी-हज़ूरों पर ग़ज़ल कह दूँ। सियासी महफ़िलों में है सभी की अहमियत यारो, मदारी पर कहूँ कुछ या जमूरों पर ग़ज़ल कह दूँ। किसी वातानुकूलित कक्ष में बिठलाइए मुझको, किसानों के पसीने पर, मजूरों पर ग़ज़ल कह दूँ। महज़ पैरोडियाँ गढ़कर उसे कविता बताते हैं, उन्हीं साहित्य के आधे-अधूरों पर ग़ज़ल कह दूँ। भिखारी की तरह जो तालियों की माँग करते हैं, कहो तो शायरी के बेशऊरों पर ग़ज़ल कह दूँ।

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