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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 70, अक्टूबर(प्रथम), 2019

दोहे सुशील यादव के

सुशील यादव

देखे अपनों के यहाँ , बदले- बदले रंग ...। बेबस मन को तौलते ,दुविधा के पासंग ..।। लोगों की पहचान में , हो जाती है देर ...। खुशकिस्मत अंधे यहां ,जिनके हाथ बटेर ..।। मैं हूँ अपने आप से , इधर बहुत नाराज ...। सूरज सुख का ढल गया , नींद खुली लो आज ..।। सुधियों के आंगन कभी ,रहती थी मुस्कान ...। हुआ अभी मन लापता ,खोकर खुद पहचान ..।। शायद मेरे मर्म तक ,पहुँच न पाते आप...। मेरे कद का इस लिए , लेते रहते नाप..।। इस बहाव में क्या करें ,जल के भीतर मीन...। जाना था जापान तो ,पहुच रही है चीन..।। संभव सा दिखता नहीं , रुके कहीं बहाव...। लौट चले लेकर हमी,अपनी टूटी नाव..।। जब भी छूती ये नदी , खतरा क्रूर निशान...। बह जाता है साथ में,हाथो का सामान..।। सावन का अंधा हुआ . हरे -हरे की सोच...। हरी-हरी के जाप में , भूलो कण्टक मोच..।। सावन का अंधा हुआ ,सोच हरा चहुँ ओर...। बिगड़ी शायद यूँ बने ,जोर लगा कुछ और..।। केवल इतना ध्यान रख , होय नहीं अभिमान...। तीर वहीं हो लक्ष्य में , मछली आँख निशान..।। हरि अर्जुन को दे गए ,गीता में सन्देश...। रण में जो है सामने ,न बन्धु- सखा नरेश..।। दुविधा के हर मोड़ पर ,देता था जो ज्ञान...। कृष्ण बना था सारथी , तज कर तेज महान..।। लीला जिसकी देख के ,चकित विश्व सब ओर...। ऊँगली में पर्वत उठा , रोका बारिश जोर..।। राजनीति में जो निपुण, किया अधर्म विरोध...। हम ऐसे प्रभु कृष्ण पर , करे सार्थक शोध..।। बिगड़ी बात बनी नहीं , सावन बीता जाय...। मेरे संकट काल को , कौन दिशा बतलाय..।। जरासंघ अपराध हो , या रिश्तों में कंश...। गर्व मीन को ले उड़े , काल- समय का हंस..।। दिखता मुझको सामने , हर कोई नाराज...। जिसका बिगड़ा कल रहा ,कैसे सुधरे आज..।। राम नाम की नाव थी ,खेने बाला ख़ास...। रामायण पहुचा गया , घर-घर तुलसीदास..।। एक मनुज है अवतरित ,जिसका नाम सुशील...। पाँव हरेक निकालता , घृणा -द्वेष के कील..।।

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