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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 70, अक्टूबर(प्रथम), 2019

एला और लवंग

डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

सज्जनता का हो गया, दिन में सूरज अस्त। शठ करते हठयोग को, होकर कुण्ठाग्रस्त।। -- नित्य-नियम से था दिया, जिनको भी गुण-ज्ञान। वो चोरी में लिप्त हो, बन बैठे शैतान।। -- भूल गये कर्तव्य को, पण्डित और इमाम। पका-पकाया खा रहे, सारे नमक हराम।। -- रोज बदलते जा रहे, चोला और जबान। बन्दीग्रह में बन्द है, लोगों का ईमान।। -- मंजिल पाने के लिए, राह चुनी आसान। लगे बाँटने ज्ञान को, दुनिया को नादान।। -- बिगड़ गया है आचरण, बिगड़ा जीवन ढंग। निगल रहे हैं महक को, एला और लवंग।। -- लूट रहे हैं शान से, कथित सुखनवर कोष। छलनी को दिखते नहीं, खुद अपने ही दोष।। -- उजड़ गयी है वाटिका, दूषित हुआ समीर। कालजयी साहित्य का, हरण हो रहा चीर।।

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