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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 70, अक्टूबर(प्रथम), 2019

ढल गईं उम्र

अजय प्रसाद

ढल गईं उम्र,ख्वाहिशें हरी की हरी रह गईं सारी हेकड़ी उसकी धरी की धरी रह गईं । मौत मेहबूबा थी तो गिरफ्तार कर लिया जिंदगी बेबफ़ा थी सो बरी की बरी रह गई । रुखसत हूआ वो यूँ मुस्कुराते हुए मिलकर होठों पे हँसी पर आखें भरी की भरी रह गईं । हक़ीक़त में हासिल करना था नामुकिन उसे आँखों में बन ख्वाबों की परी की परी रह गईं । इस कदर हालतों ने कर दिया खौफजदा उन्हें हसरतें दिल की मेरी सब डरी की डरी रह गईं ।

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