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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 70, अक्टूबर(प्रथम), 2019

मैं कहता हूँ गजल

अजय प्रसाद

जिम्मेदारियों के साथ , मैं कहता हूँ गजल हद से बाहर होती है बात मैं कहता हूँ गज़ल । हसरतों,ख्वाहिंशो,जरूरतों से जाता खिलाफ़ कर वक़्त से दो-दो हाथ ,मैं कहता हूँ गजल। दिन जिंदगी के जंजालों से,शाम चाहनेवालों से उलझती है जब मुझसे रात ,मैं कहता हूँ गजल । थकन,घुटन,चुभन,क्या-क्या सहता है ये बदन फिर जब लड़ती है हयात , मैं कहता हूँ गजल । उदास मन,बेचैन धुन,है जिन्दगी जैसे अपशगुन ताने देते है जब मेरे हालात,मैं कहता हूँ गजल । झुलस गई जिन्दादिली जद्दो-जहद की आग में लगते है जलने जब जज्बात ,मैं कहता हूँ गजल ।

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