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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 70, अक्टूबर(प्रथम), 2019

वो मुझको मेरे अन्दर से ले गया

अजय प्रसाद

वो मुझको मेरे अन्दर से ले गया सारा पानी ही समंदर से ले गया । न लहरें ,न कश्ती ,न अब किनारे है पूरी हस्ती यूँ सिकंदर से ले गया । जिंदादिली जिंदगी मे रुक सी गई सारी मस्ती वो कलंदर से ले गया । जकड़ लिया जिम्मेदारियों ने उसे ज़ोशो जूनून सारे धुरंदर से ले गया । रह गयी विरानियां उम्रभर के लिए भरी महफिल ही अंदर से ले गया ।

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