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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 70, अक्टूबर(प्रथम), 2019

वेद के ऋषि ने सूर्य को `अग्नि का चक्षु कहा है
रोज सुबह हो रही सूर्योदयक्रांति अर्थात्.......

लेखक: पद्मश्री डॉक्टर गुणवंतभाई शाह
अनुवादक: डॉ. रजनीकान्त एस.शाह

उघड रही उषा को निरखना तो एक आध्यात्मिक अनुभूति है।
रोज सुबह सूर्य निकलता है तब ताजगी उगती है,फुर्ती उगती है और
साथ साथ जीवन उगता है और यदि समझ उगे तो मानव भी उगता है!

रात्रिवेला में जब मनुष्य शैयावश होता है तब उसे पूरा विश्वास होता है,कि कल सुबह होगी तब सूर्य भी उगनेवाला ही है। हम जल्दी जग जाएँ या देरी से उठें परंतु सूर्यदेवता तो अपने निश्चित समय पर पूर्वाकाश में आ ही जाते हैं। रोज सुबह सूर्य निकलता है तब ताजगी उगती है,फुर्ती उगती है और साथ साथ जीवन उगता है और यदि समझ उगे तो मानव भी उगता है! मौका मिलने पर उघड़ती हुई उषा को निरखना तो एक आध्यात्मिक अनुभूति है। सुबह होने पर उठना से क्या तात्पर्य है? ऐसा प्रश्न नहीं पूछने में ही निरांत का निवास होता है। नींद में हमारा `मैं’ सुबह होने पर जागता है। वह धीरे धीरे जागता है और चाय पिता है,नाश्ता करता है,अखबार पढ़ता है और बड़ी उबासी ले लेने के बाद अपनी रोजी-रोटी के लिए सज्ज होता है। यह उबासी आखिरकार है क्या? आलस्य के दरमियान शरीर में जमा हुए कार्बन डायोक्साइड को बाहर निकालने का मिकेनिजम है। उबासी लेते समय कार्बन डायोक्साइड के साथ थोड़ा सा द्वेष,थोड़ा सा बैरभाव,थोडा सा ईर्ष्याभाव और थोड़ी सी कटुता भी बाहर निकल जाए ऐसा प्रावधान कुदरत ने किया होता तो पृथ्वी पर युद्ध नहीं रहता। वेद के ऋषि ने खुलती उषा के लिए हर विशेषणों को प्रयुक्त किए हैं: `शुचि,पावक,वैभवी और शोभायुक्त।’ इश-उपनिषद के ऋषि दीर्घतमस ने सूर्य को `पूषन्’(पोषण करनेवाला) कहा है। अन्य ऋषि ने सूर्य को `काल की योनि’(कालस्य योनि) प्रमाणित किया है। इस प्रकार अनंत का उत्सव रोज सुबह शुरू हो जाता है।थोड़ी दूर मस्जिद के मीनार से अंतर की आरजू के साथ कोई भक्त विश्व के सृजनहार से कहता है :`तुम रहमान(कृपालु) हो और मेहरबान हो।’

समग्र आकाश में साम्राज्य फैल चुका होता है। आकाश और धरती पर फैली सूर्योदय क्रांति का सूत्र है: `तमसो मा ज्योतिर्गमय।’ हृदय के द्वार पर कोलबेल नहीं होता। उस द्वार पर तो स्नेहभीनी संवेदना(प्रेमभाव) की हल्की सी दस्तकें भी प्रियजन को सुनाई देती हैं। खिड़की-दरवाजे बंद हो तब भी कहीं रह गई दरार से कुछ किरणें चूपचाप कमरे में दाखिल हो जाती हैं।रोज सुबह योजित होनेवाले बिदाई समारोह को आपने कभी देखा है? उस विराट समारोह की अध्यक्षता सूर्य करता है। उगते सूर्य की प्रतीक्षा करनी पड़ती है क्योंकि सूर्य VIP है। रोज होनेवाला यह प्रतिक्षायोग ही पूजा और वही अध्यात्म! अंधेरा बिदा लेता है तो वह भी पूरी गरिमा के साथ बिदा लेता है।सूर्य प्रकाश अंधेरे को धक्का देकर निकाल बाहर नहीं करता।


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