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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 5, अंक 97,नवम्बर(द्वितीय), 2020

ज़्यादा वाले देखो..........

वीरेन्द्र कौशल

ज़्यादा वाला देखो थोड़े वाले को खा ड़ांटते रिश्वात को भी बस सुविधा शुल्क बता ग्रांटते थोड़ी ही शर्म बची रही य़कीनन अब तक खा दवाई की गोलियां उसे भी पचा बांटते ज़्यादा वाले देखो..... सरकारी नौकरी वाले सब पर अपना रौब झाड़ते बड़ी चतुराई से अपनी नैतिक ज़िम्मेवारी से भागते काम वही करते सदा यही दर्शाते सीना तान लाज-शर्म भी डूबती ज़ब धनियां संग सब्जी मांगते ज़्यादा वाले देखो.... ज़ितना काम उतना दाम गर सभी ऐसा मांगते इनकी तो बस निकल पड़ी सभी ऐसा मानते दे कर गुप्त चढ़ावा जुबां तक रखे बंद फिर बंद दरवाज़ों से ही सभी को हांकते ज़्यादा वाले देखो....... ज़ायज़ काम भी रोके पलभर में ऐसा बांचते ज़वाब हमें भी देना फिर ऐसे ही जांचते उलटी पड़ जाती ज़ब खुद के ही नकेल रंग बदल गिरगिट सा बन शरीफ़ सब फांदते ज़्यादा वाले देखो......


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