मुखपृष्ठ
साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 5, अंक 97,नवम्बर(द्वितीय), 2020

दरिया जैसा है

सुरेंद्र सैनी बवानीवाल 'उड़ता'

ख़ुश रहते हैं दिल अपना दरिया जैसा है उन्मुक्त बरसते हैं आदतन बदरिया जैसा है किसी से भी कोई शिकायत नहीं करते सबकुछ ही अच्छा वाला नज़रिया जैसा है साथ - साथ चलते हैं जरुरत में सभी की शहर का हर शख्स अपना जिगरिया जैसा है अपनी हर बात पर अड़िग रहते हैं सदा अपना इरादा और हौसला सरिया जैसा है प्यार में चोट खायी तो क्या खायी "उड़ता" गुजरती हुई रात सब खबरिया जैसा है.


कृपया रचनाकार को मेल भेज कर अपने विचारों से अवगत करायें