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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 5, अंक 97,नवम्बर(द्वितीय), 2020

भूख का नर्तन

सुरेंद्र सैनी बवानीवाल 'उड़ता'

रेल की पटरीयाँ और उनपर पड़ी दो लाशें कैसे उठाऐं किसे तलाशें एक आदमी और एक जानवर दोनों कट गए इत्तफाकन एक दूसरे से सट गए लोग उचक-उचक देखते आते और चले जाते समय का परिवर्तन हुआ भूख का नर्तन हुआ अब भीड़ बढ़ रही थी लाश को उठाने को खड़ी भीड़ आदमियों की थी लड़ रही थी लड़ती रही लाश आदमी की सड़ती रही भीड़ ने आदमी की लाश का क्या करना था उससे किसका पेट भरना था.


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