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Sahityasudha
वर्ष: 5, अंक 97,नवम्बर(द्वितीय), 2020

कोशिशों का दौर

सन्तोषी किमोठी वशिष्ठ

कोशिशों के इस आखिरी दौर में निकल चुकी हूँ, दरिया की बूंदों में जो चमक थी वो समन्दर में कहाँ,। रंग बिरंगी चमकती सीपियों से भरा समन्दर है, पर दरिया की बूंदों सी चमक कहाँ,,।। धुंधला पड़ा है समन्दर मोतियों की आपा, धापी में, किसी के पास वक्त कहाँ,। दरिया की बूँदें गिरती भी,!थी, तो सलीके से गिरती थी,, अनजान रास्तों से होता था गुज़रना, उसके पास समन्दर जैसी विशाल जगह कहाँ,,।। कोशिशों के इस आखिरी दौर में निकल चुकी हूँ, समन्दर से दरिया की ओर निकल पड़ी हूँ,, उन बूंदों में जो अमृत रस था, वो इस समन्दर में कहाँ, कोशिशों की जो पहली सीढ़ी माँ की चौखट पे चढ़ी थी वो इन महलों में कहाँ,,।। उतरते हुए गिरी थी तो सम्भलने का मौका मिला था वहाँ, यहाँ तो डूबते ही गये, वो गिरकर सम्भलने वाली पत्थरों की मान्देण कहाँ,। जो प्यास माँ की एक बूँद दूध से बुझती थी, वो बात सारे समन्दर में कहाँ,,।। ऊँचाईयों से गिरने का शौक था, मिट्टी का मीठा अहसास था टेढे-मेढे रास्तों से जो गुजरने शौक वहाँ था,, वो इन एक जैसी मंजिलों मे कहाँ,। वो चलते हुए पैरों में चमकती हुई पैजबियों की खनक जो वहाँ थी, वो इस शान्त दरवाजे के पीछे बैठे समन्दर में कहाँ,,।।


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