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Sahityasudha
वर्ष: 5, अंक 97,नवम्बर(द्वितीय), 2020

पेशी

मुरलीधर वैष्णव

क़ब्ज़े में है जो उसके, चीज़़़ मेरी थी पुश्तैनी मिलेगी एक दिन तुझको, दिलासा दे रही पेशी है गहरी नींद में फाइल, परेशां तुम नहीं होना इसे चाहो जगाना तुम, तो भी कुंभकरण पेशी। यहां चक्कर ही चक्कर है, कहूं किससे किधर जाऊं वकीलों का है पेशा, और माने है फ़क़त पेशी एक लेता यहां पेशी, दूसरा दे रहा पेशी बनाती है यहां फ़रीक़ को, फ़क़़ीर यहां पेशी ये लंका है, इसे खुद हाथों से हमने बनाया है दरवाजे पे सुरसा सी, बैठा दी है यहां पेशी भाई भाई का दुश्मन है, बाप बेटे में है तकरार यहां अक्सर ये देखा है, कि रिश्ते तोड़ती पेशी किसी की जेब से उग कर, ये फैली अमर बेल है इसकी हर शाख़ पर उगता, चांदी का फूल है पेशी इक उम्र भी कम है, इसका राज़ समझने को विरासत में मेरी औलाद को, दे जा रहा पेशी किसी बेवा की फ़ाइल पर, लगा कर कान तुम सुनना कलम से आंसू टपकाती, सिसकती रूह है पेशी दोस्त, इस तीरग़ी में भी एक लौ है रोशन मुंसिफ़ जो मुंसिफ़ हो इंसाफ-ए-दरिया है पेशी


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