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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 5, अंक 97,नवम्बर(द्वितीय), 2020

तो बात सरेआम करता है

हँस राज ठाकुर

अगर हम मुसाफिर हैं , तो ज़िंदगी एक सुहाना सफ़र , हर किसी की अपनी मंज़िल , हर किसी की अपनी डगर I क्या गज़ब की चीज़ है किस्मत भी , क्या कर्म की कलम से लिखी जाती , क्या अमीरों की किस्मत अलग कलम से , और गरीबों के लिए कलम बदल दी जाती I अपरंपार है तेरी माया ईश्वर , अजब खेल तूने रचाए हैं , कहने को तो तेरे अपने हैं सब , क्या हकीकत में कुछ पराये हैं I उलझा रखा है ज़िंदगी देकर , अपनी माया के चक्कर में , गर सभी में तेरा रूप है मालिक , तो इंसान से इंसान क्यों टक्कर में I “हँस” तो ठहरा आम आदमी , आम दिल से बात करता है , प्रभु एक ही मुँह दिया है तूने , तो बात सरेआम करता है I


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