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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 5, अंक 97,नवम्बर(द्वितीय), 2020

गीतिका

प्रीती श्रीवास्तव

पल भर को तूफां आया हो जैसे। कजा ने अपना रूप दिखाया हो जैसे।। हर इन्सां क़े चेहरे पर खौफ था। जुबां खोलने मे भी डर समाया हो जैसे।। भरी बज्म मे हर कोई अकेला हो गया। रात ने भी अश्क बहाया हो जैसे।। पहरेदारों ने फिर बाग लगायी। कैद करने को खुदा उतर आया हो जैसे।। पसरा हुआ था सन्नाटा हर तरफ। तभी वीरांने में काफिला नजर आया हो जैसे।। जिन्दगी फिर मुस्कुराने लगी खुली हवा में। कदम से कदम मिलाने का वक्त आया हो जैसे।।

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