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वर्ष: 3, अंक 49,नवम्बर(द्वितीय)  , 2018



चुनावी त्यौहार दिवालिया घोषित हो


शुचि 'भवि'


अचानक ही चीख़ने और चिल्लाने की आवाज़ों ने नींद खोल दी।दीपावली,होली,गुरुपूर्णिमा,अक्षयतृतीया,ईद,क्रिसमस,गुरुपूरब,और कितने ही पर्व सब त्राहि त्राहि कर रहे थे।कोई रो रहा था, कोई चीख़ रहा था, कोई चिल्ला रहा था, कोई तो धमका भी रहा था।

शोर सुन,मैं भी छत पर दौड़ी,देखने कि आख़िर हुआ क्या है, इतना भयावह कानफोड़ू शोर,किसका और क्यों है?पड़ोस की छत से मालूम हुआ कि सभी त्यौहारों को दिवालिया घोषित कर दिया गया है और अब सारे धरना देने की सोच रहे हैं । मगर क्यों, भारत में तो त्यौहार का बड़ा मान सम्मान है?

अरे, किस ज़माने की बात कह रहीं हैं आप,बीत गए वो दिन और अब बस सुनहरी यादें ही शेष हैं। क्या आपको नहीं मालूम कि अब सब कुछ ऑनलाइन ही हो गया है। सारा धमाका,सारी ख़ुशी, सारा गायन, नृत्य सब कुछ ही तो नेट ने लील लिया है।अब दीवाली में ऑनलाइन मिठाइयाँ आती हैं,अब कहाँ गृहणी को पता होता है कि पड़ोस में क्या पकवान बना,उसे बनाने की विधि क्या होगी,अब तो यू-ट्यूब ही शिक्षिका है, अब कहाँ कोई घर-घर प्रसाद की थाली ले जाता है और दिवाली की शुभकामना दे आता है,दीवाली के दीपक,तेल,बाती,रंगोली,

दूज का टीका,सब कुछ घर बैठे उपलब्ध है।गहने, बर्तन धनतेरस पर अब घर में ही धनवंतरी जी के साथ पधारते हैं ।रंगोली स्टीकर में समाहित हो चुकी है, साल भर चिपकती हैं,अब कहाँ आँधी और बारिश से उसके बिगड़ने का डर सताता है और कहाँ हैं अब गोबर ढूँढते लोग,आँगन भी नहीं बचे जिन्हें लीप कर सूखने का इंतज़ार होता था रंगोली सजाने के लिए।

होली पर भी अब चर्म रोग अधिक हो गए,ख़ुशी कम,प्रेम का रँग गुलाल तो बस राधा-कृष्ण के युग तक ही रहा था।

अब तो हर त्यौहार की एक ही विशेषता बस शेष है और वो है सोम रस।

बच्चों के पूछने पर त्यौहारों का मर्म भी गूगल सर्च द्वारा समझा दिया जाता है।

अब कौन लिखता है निबंध स्कूलों में त्यौहारों पर?

चुनावी त्यौहार ही बस अब इकलौता ऐसा त्यौहार जो दिवालिया नहीं घोषित हुआ है।आज न्यायालय ने अन्य सभी त्यौहारों को दिवालिया घोषित कर ही दिया।सभी त्यौहार इसलिए सड़क पर रैली निकाल रहे हैं और भूख हड़ताल की धमकी दे रहे हैं कि हम सब के होते हुए कैसे चुनावी त्यौहार को सर्वश्रेष्ठ और हमें दिवालिया कहा??


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