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वर्ष: 3, अंक 49, नवम्बर(द्वितीय) , 2018



इक उम्र हुई अपनी दास्ताँ कहे हुए


डॉ० अनिल चड्डा


 
इक उम्र हुई अपनी दास्ताँ कहे हुए,
वो आज भी जाने क्यों बहरे बने हुए।

हसरत रही हसरतें भी पूरी हों कभी,
मुद्दत हुई दिल को कोई खुशी मिले हुए।

अँधियारी गालियों में कब तक चलेंगे हम,
कोई राह तो मिले हमें रौशन हुये हुए।

दीवानों को समझा कोई इस जहाँ में कब,
बर्बाद हो रहे हैं वो पगले बने हुए।

मासूमियत तो देखिये फितरत में उनकी आप,
आंखों में कुछ औ” दिल में कुछ रखे हुए।		 
 

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