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वर्ष: 3, अंक 49, नवम्बर(द्वितीय) , 2018



बिना दुश्वारियों के ज़िंदगी क्या


अजय अज्ञात


 
लतीफ़ों को मैं कह दूं शाइरी क्या?
मुझे नादाँ समझ रक्खा अजी क्या?

अमीरे शह्र को ख़ुश करने ख़ातिर
तमाशे कर रही है मुफ़लिसी क्या?

मेरे चेहरे पे क्यों नज़रें टिकी हैं
कभी देखी नहीं तुमने ख़ुशी क्या?

समंदर में समा जाती हैं नदियाँ
इसी को कहते हैं दरियादिली क्या?

संवारो मुझ को मेरा आईना बन
दिखाओ मुझ में है आख़िर कमी क्या?

सफ़र के बाद मंज़िल का मज़ा है
बिना दुश्वारियों के ज़िंदगी क्या?		 
 

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