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वर्ष: 3, अंक 49,नवम्बर(द्वितीय)  , 2018



पिता


राजीव कुमार


पिता के डांटने पर राहुल घर छोड़कर चला गया और पत्र में लिख गया कि ‘‘अब कभी नहीं आऊंगा।’’

काली अंधेरी रात का समय, सुनसान जगह पर पेड़ के नीचे गुजारी। डर के मारे तो उसके रोंगटे खड़े हो गए थे।

जैसे-तैसे महानगर पहुंचा। एक सेठ ने उसको काम पर रखते हुए कहा, ‘‘तुम यहां सबसे छोटे हो, किसी बात की चिंता मत करना। थोड़ा-बहुत काम करना और खाना-पीना और घूमना।’’

कुछ दिनों के बाद राहुल को मां की यादें सताने लगीं तो घर जाने का मन बनाया, मगर पिता का चेहरा याद आते ही उसने अपना इरादा बदल दिया। एक सप्ताह घुटन और अकेलेपन में दिन गुजारने के बाद, सेठ से घर जाने की बात कही तो सेठ ने कहा, ‘‘यहां से बाहर गए तो तुम्हारी खैर नहीं।’’

12 वर्ष के राहुल से 32 वर्ष वाले जितना काम लिया जाता। जो भी थोड़ा-बहुत पैसा मिलता तो कल्लू छीनते हुए कहता, ‘‘सेठ जी से अगर शिकायत की तो टांगें तोड़ दूंगा।’’

सेठ जी भी बीच-बीच में पुलिस का नाम लेकर डराते रहते थे।

एक तरफ सेठ जी का डर, एक तरफ कल्लू का डर, एक तरफ पुलिस का डर, राहुल को अंदर ही अंदर कमजोर करने लगा।

मौका मिलते ही रात के सन्नाटे में राहुल भाग निकला, मगर घने जंगल में भूत-पिशाच का डर। राहुल के मन-मस्तिष्क में बैठ गया कि सब उसका पीछा कर रहे हैं और पकड़ में आते ही मेरी जान ले लेंगे।

दो-चार घंटे की कशमकश के बाद ‘घर जाऊं कि नहीं जाऊं’ जब राहुल घर गया तो मां-पिता का रोता हुआ चेहरा देखकर वो भी रोने लगा। मां ने चुम्मी ली, पिता ने गोद में लेकर कहा, ‘‘कहां चला गया था बेटू, हम लोग बहुत परेशान थे।’’

राहुल ने अपने पिता का चट्टान-सा सीना स्पर्श करते हुए मन में कहा, ‘‘अब जो आता है आए, बेटू सेठ, काला कल्लू या पुलिस।’’

राहुल का सारा डर गायब हो गया।

पिता के महत्व को तब राहुल ने समझा।


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