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वर्ष: 3, अंक 49,नवम्बर(द्वितीय)  , 2018



गृह प्रवेश


राजीव कुमार


लक्ष्मी स्वरूपा, कमलनयनी, सर्वगुणसंपन्न और न जाने क्या-क्या गुण मीरा ने अपनी बहू के बारे में सुन रखे थे। गृह प्रवेश कराते हुए मीरा ने अपनी जेठानी से कहा, ‘‘लाखों में एक है मेरी बहू। अब देखना ये घर स्वर्ग हो जाएगा।’’

मीरा अपनी बहू को पलंग पर बिठाकर, सगे-संबंधियों के हवाले छोड़कर चली आई, अपनी बहू के भाई के पास। बहू के भाई को चाय-नाश्ता कराने के बाद मीरा मुख्य मुद्दे पर आई, हाथ बढ़ाते हुए बोली, ‘‘हां, तो बेटा, तुम्हारे पिताजी ने वादा किया था कि बेटी के गृह प्रवेश के समय तक आपको रुपया मिल जाएगा, अब जल्दी से दे दो।’’

लड़की का भाई सकपकाते हुए बोला, ‘‘मम्मी जी, वो-वो...बंदोबस्त नहीं हो पाया, मगर जल्दी ही बंदोबस्त हो जाएगा।’’

मीरा वहां से जल्दीबाजी में उठी और बहू के पास सामने घूरते हुए खड़ी हो गई। मीरा को अब उसकी बहू लक्ष्मीस्वरूपा नहीं लग रही थी, कमलनयनी तो बिलकुल भी नहीं और बिना गुणवाली स्त्री लगने लगी। मीरा की बहू अपनी सास को सहमी नजर से देख रही थी, उसको उसकी सास राक्षसों की महारानी लग रही थी।


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