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वर्ष: 3, अंक 49, नवम्बर(द्वितीय) , 2018



अकेला दीप


सुशील शर्मा


                            
मेरा ही प्यार सहसा मर गया होगा। 
तुम्हारा मन इतना निष्ठुर तो नहीं था। 
कि झरे हुए अमलतास के फूलों को देख कर. 
तुम्हारा वक्ष धड़का न होगा। 

वेदना सी प्रखरा यादें तुम्हारी।   
अभिसारी स्मृति के सुख से सदा वंचिता सी।  
टिमटिमाती ज्योति सी, 
प्रमत्त-मन में झूमती वो आशा हमारी। 


स्वयंसिद्धा अनवरत ढूंढती तुम्हे। 
वो आँखें जो कभी थीं प्याले तुम्हारे 
प्रणय में संलग्न वो पल ,
तुम्हारे अस्तित्व में डुबोते हमें। 

मरुदीप सा अब आकाश लगता है। 
दर्द की संवेदनाओं का ,
अश्कों की स्याही में डूबा 
समय के पृष्ठों पर लिखा 
अलिखित इतिहास लगता है। 

अकेला दीप सा जलता हुआ मैं ,रुको 
वेदना के ज्योति कणों सा रिस रहा हूँ। 
मेरा ही प्यार सहसा मर गया होगा। 
तुम्हारा मन इतना निष्ठुर तो नहीं था।
कि बुझते हुए दीये को ,
अपने आँचल का सहारा न दे सको। 
 

                          

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