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वर्ष: 3, अंक 49, नवम्बर(द्वितीय) , 2018



नये जगत को हंसते देखा


शशी तिवारी


                            
बीते युग के खंडहरों में नये जगत को हंसते देखा। 
       इस दुनिया की बात निराली,
        पीती मदिरा भर भर प्याली,
          बड़े बड़े गम उसमें खोकर
         बन जाती है भोली भाली। 
मजबूरी को दानवता के पाप अंक में कसते देखा। 
        कहीं रूप का ज्वार बढ रहा
        सुन्दरता में प्यार कढ रहा,
         भटक गए जो पाँव उन्हीं का 
         खुले आम बाज़ार चढ रहा
कभी बरछिया चला गये जो उन नयनों को धंसते देखा। 
         श्वेत वस्त्र में छिपी दलाली ,
          बेच रहा फूलों को माली,
         चमक रहे सिक्के पाने को,
         नाच रही है रजनी काली। 
भोली भाली सुन्दरता को नीच पंक में फंसते देखा। 
                         

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