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वर्ष: 3, अंक 49, नवम्बर(द्वितीय) , 2018



टूटते एहसास


सत्येन्द्र बिहारी


                           
असत्य पे सत्य की जीत चाहिए ,
अधर्म पे धर्म की जीत चाहिए
हिंसा पे अहिंसा की जीत चाहिए,
पाप-पुण्य का लेख चाहिए ।
घर-घर में  है बैठा रावण ,
अब हर घर में एक राम चाहिए ।
ना रंग रूप ना भेष-भूषा,
कर सके पहचान वो आंख चाहिए ।
शोषित अब हर नर- नारी ,
दे सके सम्मान वो समाज चाहिए ।
घर-घर में है बैठा रावण,
अब हर घर में एक राम चाहिए ।
दरकते अब रिश्ते -परिवार,
ला सके विश्वास वो एहसास चाहिए ।
लुटती अबला घर कभी बाहर,
कर सके इंसाफ वो इंसान चाहिए ।
घर - घर में है बैठा रावण,
अब हर घर में एक राम चाहिए ।
भ्रष्टाचार शोषण अत्याचार का संघार,
कर सके  जो सरकार चाहिए ।
गरीबी बन गई अभिषाप,
मिटा सके इस पाप को जो तलवार चाहिए ।
घर - घर में है बैठा रावण,
अब हर घर में एक राम चाहिए ।
जाति पाती रूढ़ि आडम्बर,
पाखंड खण्ड कर सके वो ज्ञान चाहिए ।
अमृषा चोरी हत्या पाप मिटाकर,
रामराज ला सके जो राम चाहिए ।
घर - घर में है बैठा रावण,
अब हर घर में एक राम चाहिए ।
 

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