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वर्ष: 3, अंक 49, नवम्बर(द्वितीय) , 2018



मन का वो कोना


रश्मि सुमन


                           
मन का एक हिस्सा खुशियों से लबालब
तो दूसरे हिस्से में रुदन भरा,
जैसे किसी वृक्ष में कभी फूल ही न खिले हों...

जैसे......जैसे किसी नदी में हो
जो चट्टानों के कारण बह ना सकी
और सागर से मिल भी ना सकी....

उस वृक्ष की पीड़ा किसी ने जानने की कोशिश नहीं की
जिसमें फूल कभी नहीं आ सकते,
सुगंध भी छिपी रहती है उसके प्राणों में
उहापोह से भरा रहता मन का वो हिस्सा.....

जड़ों से मुक्त होना भी चाहता
पंछी बन उड़ना भी चाहता
पंख फैलाना भी चाहता
चाँद तारों से बातें करना भी चाहता.....

जब तक सुगंध फूलों से तृप्त न हो जाये
तब तक वृक्ष तृप्त नहीं हो सकता...

तब तक.....तब तक कैसी तृप्ति ?
तब तक कैसी शांति
कैसा संतोष और कैसा आनंद ?

ऐसा ही एक वृक्ष हम सबमें
कहीं न कहीं
मन के किसी कोने में....

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