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वर्ष: 3, अंक 49, नवम्बर(द्वितीय) , 2018



बहार की आहट


जनकदेव जनक


                         
कल का दिन किसने देखा है
आज का दिन हम खोयें क्यो!
जिन घड़ियों में हंस सकते है
उन घड़ियों में हम रोएं क्यो?
                        बाद मुद्दत के चमन में बहार आई है
                        बाद मुद्दत के गुलों पर निखार आई है
                        कितनी दिलकश मजलिश है तारों की
                        चांदनी भी अपनी घूंघट उतार आई है
बहार आई है हर कली नाजनीन लगती है
जिधर देखता हूं हर कली हसीन लगती है
झुका- झुका सा लगता है आसमां भी
उठी- उठी सी कुछ जमीं आज लगती है
                         झूमती हुई हवा है हर कली नशीली है
                         बादल के घूंघट में चांदनी शरमिली है
                         होशो हवाश तो दुरुस्त है ऐसा लगता है
                         आज कुछ ज्यादा ही शराब पी ली है
बहार आई है हर कली चुम लेने दो
हर तरह की शराब पीकर झूम लेने दो
न जाने कब आ जाए मौत मेरे दोस्त
मुझे जिंदगी की हर गली में घूम लेने दो
                          महफिल से अब निकलने निकलने को हूं
                          बहुत गुनाह कर चुका हूं अब संभलने को हूं
                          अब ना रोको अपना जाम भरके दे दो मुझको
                          रात ढल चुकी है अब मैं चलने चलने को हूं
गालों पर गुलाब सी खूबसूरत लाली है
होठों पर अवेहयात की नाचती प्याली है
क्या यही दस्तुर है तेरी महफिल की साकी
तेरे पास सागर और मेरा जाम खाली है
                           जब देखा था तुझे तेरी उम्र बहुत कम थी
                           धखिली सी कली थी मासूम शबनम की
                           तेरी आंखें लगती थी जैसे जाम हो लेकिन
                           मदहोश करने के लिए शराब बहुत कम थी
 

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