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वर्ष: 3, अंक 49, नवम्बर(द्वितीय) , 2018



दिल में चुभता शूल


हरिहर झा


                         
मिल गये विरासत में मुझको, 
कुछ मुस्काते फूल 
अचरज़ भरी नज़र से देखूँ,  
काँटे और बबूल 

उड़ान पंछी की, वसियत में, 
सौ रंग की दुनिया    
चिड़िया के पंखो से सज कर  
खुश मेरी बिटिनिया
 
चन्दा, सूरज मुझे मिल गये,
स्थिति कहाँ प्रतिकूल? 

पहनाये जेवर हाथों से,  
बहना है निर्दोष
लोन झगड़ कर मेरे हिस्से, 
यही बड़ा संतोष
’टा.. टा’ जज ने पहने विग को
सभी विवाद फिज़ूल 

पंचपात्र पीतल या सोना,  
जोहरी करे परख
चचा बन्दर-बाँट चाहें 
कहते हमें मूरख 

परेशान झुर्री चाची की, 
दिल में चुभता शूल ।
 

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