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वर्ष: 3, अंक 49, नवम्बर(द्वितीय) , 2018



हम तो मत के दाता ठहरे ...


सुशील यादव


                            
पाँव यहीं जमा लो भइया
धूनी इधर रमा लो भइया
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तुम पाँच बरस बाद दिखे हो
फिर  हिसाब सम्भालो भइया
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हम तो मत के दाता ठहरे
डाका जम के डालो भइया
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हमें  पार तो  बाद लगाना
खुद को 'बेल' छुड़ा लो भइया
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बनी हुई बरसों की आदत
सच से आँख चुरा लो भइया
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चौराहा करके पसन्द मूरत
आदमकद बनवा लो भइया
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देश भला की गर सोचो तो
तम्बू राम निकालो भइया
 
                          

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