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वर्ष: 3, अंक 49, नवम्बर(द्वितीय) , 2018



तकरार की बातें


सतविन्द्र कुमार राणा


                           
हमेशा तो नहीं होती बुरी तकरार की बातें
इसी तकरार से अक्सर निकलती प्यार की बातें।

नज़र मंजिल पे रक्खो तुम बढ़ाओ फिर कदम आगे
नहीं अच्छी लगा करती हमेशा हार की बातें।

अँधेरे में चरागों-सा उजाला इनसे मिल जाता
गुनी जाएं तजुर्बे के सही गर सार की बातें।

अलग हैं रास्ते चाहे, है मंजिल एक पर सबकी
जो ढूंढें खोट औरों में करे वो रार की बातें।

सँभलने का, समझने का, सलीका आ यूँ जाता है
कि खुद की गलतियों के जो करें इकरार की बातें।

समझना चाहते हो मोल खुशबू का कहीं दिलबर
सुनो तुम ध्यान से पहले वहाँ के ख़ार की बातें।
 

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