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वर्ष: 3, अंक 49, नवम्बर(द्वितीय) , 2018



कोई ले गया मेरा चाँद


नवीन मणि त्रिपाठी


                         
हुई   तीरगी   की   सियासतें   उसे   बारहा   यूँ  निहार  कर ।
कोई  ले  गया  मेरा  चाँद  है   मेरे  आसमाँ  से  उतार  कर ।।

अभी क्या करेगा तू जान के मेरी ख्वाहिशों का ये फ़लसफा ।
जरा तिश्नगी की खबर भी कर कोई शाम  एक गुज़ार कर ।।

मेरी  हर वफ़ा के जवाब  में  है  सिला मिला मुझे  हिज्र का ।
 ये  हयात  गुज़री  तड़प  तड़प गये दर्द तुम जो उभार कर ।।

ये  शबाब  है  तेरे  हुस्न  का  या  नज़र  का  मेरे  फितूर है ।
खुले  मैकदे  तो  बुला  रहे  तेरे  तिश्ना लब को पुकार कर ।।

हैं  विरासतों  में  तमाम  गम  मेरे  सब्र  का  न ले  इम्तिहाँ ।
जरा  मुस्कुरा  के तू  पास आ  मेरा खुशनुमा ये दयार कर ।।

जो निभा सके नहीं उम्र भर  उसे  दोस्ती का भी हक नहीं । 
वो  तो  फैसला  ये  सुना गया मुझे दुश्मनों  में शुमार कर ।।

यहां  बिक  रहीं  हैं  मुहब्बतें  है  खरीदना  तो  खरीद  ले।
तू वफ़ा की अब न तलाश में नई जिंदगी को निसार कर ।।

नये  किस्म  का  है  ये शह्र भी नए आशिकों का ये दौर है ।
कहीं लग न जाये नज़र तुम्हें न चलो यूँ जुल्फें सँवार कर।।
 

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